१८ जेष्ठ २०८३, सोमबार
बि प्लस खबर

का हए गुरही पर्व ?

खबर सम्बाददाता ३० श्रावण २०७८, शनिबार
का हए गुरही पर्व ?

पश्चिमा थारु समुदाय एकएसंग गुरही मनाइ हए । धार्मिक औ सांस्कृतिक महत्व रहो गुरही तिउहार चौधरी थारु गाउँमे भव्यताके साथ मनात हएँ । दाङसे लैके पश्चिम कञ्चनपुरतकके चौधरी थारु समुदायकसे मनान बालो विक्रम सम्वत अनुसार जा गुरही पहिलो तिउहार हए ।

थारु समुदायकी पर्वकी शुरुवातके रुपमे गुरहीपर्वके लेओ करत हएँ । नागपञ्चमीके दिन जा पर्व देशभरके थारु समुदाय धुमधामसे मनाओ करत हएँ । थारु समुदायमे ‘गुरही’ मनानकी अर्थ, नाग बाबाके पुजा करसे दुसरे साँप, बिछी घरमे नाआन, घरमे आगलागी नाहोन, दुःख कष्ट हटन, रोगव्याधी ओ महामारी घरमे प्रवेश नाकरत हए कहिके विश्वास करोजात हए ।

कैसे मानत हए गुरही ?
चौधरी थारु समाजमे जा तिउहार ओर पूजासे कुछ फरक मेलकी मानत हएँ । परापूर्व कालसे मनात आए थारु समाजके पहिलो तिउहारके रुपमे ‘गुरही’के लेत हएँ । खेतीपाती उसारके सबजनै घरएम फुर्सत बैठे समयमे आनिया जा तिउहार साउन शुक्ल पञ्चमीमे पडनसे जाके नागपञ्चमीके रुपमे फिर चिनत हएँ । थारु समाजमे ‘गुरही, गुर्या’ कहिके मनानबालो जा पर्व नेपाली भाषामे नागपञ्चमी कहिके मनानबालो दुने तिउहार एकए हए । नागपञ्चमीमे विशेष करके नेपाली नाग देवताकी पूजा करत हएँ कहेसे चौधरी समाजमे ‘गुरही’ पूजा करत हएँ । पर ठिहा अनुसार गुरही मनानकी प्रचलन फिर थारु समाजमे फरक फरक हए ।

वर्ष भरेक खान ताँही खेतीपातीमे सेहर भए थारु समाज जब किंचसे निकरके आत हएँ तबही आनबालो गुरही तिउहार थारु समाजके पहिलो तिउहारके रुपमे चिरपरिचित हए । साँझके समयमे जब गइयाा बर्धा घरे बाँधके तव गावके अगुवा (भल्मन्सा , चाकर) के पहलमे गाावके ददाभैया ओर दिदीवहिनिया नयाँ नयाँ कपडा पैधके थरियामे मेमेलके भुजा, दुब घाँस, रंग बिरंगकी गुडिया लैके गुरही–गुरहा ठठान बिच्चामे जात हएँ । खास करके गाावकी चौराहोमे ठठानदालो गुरहीमे गाँवभरेक युवा–युवती ओर बुढे जमान औ बच्चा चौराहोमे जमा होत हएँ ।
जब गाँवक भलमन्सा एक सांसमे दुबकी घाँसम गाँठी बाँधके या फिर एक गुडिया बनोभओ चिरकुटमे गाँठी बनाएके गुरहीगुरहा ठठानकी कहात हए तओ हुनए रहेभए लौडा लौंडिया लट्ठीसे , बेरसरमासे मारके “घुघरी डेउ” “घुघरी डेउ” कहात हए । ऐसे मारनसे गाँवमे रहे रोगव्याधी ओर डैनी,भूत सब नास हुइजात हएँ थारुसमाजमे जनविश्वास हए ।

गुरही ठठाएके अपन लाओभओ मेलमेलकी खानी चीज जैसे– जुन्ना लवा, चना, मटरा, भुजा एक–एक चोटी प्रसादके रुपमे बँट्त हएँ । जवतक थरियाके मिान खतम नम होत हएँ तबतक बच्चा “भुजा देओ, भुजा देओ कहात पिछा लागे रहात हए। । ऐसिए ठठाई भइ गुडिया और गुरही ओ रंग विरंगकी चिर, अपन घरे लैजानसे द्धारोम बाँधनसे घर रहो दुःख चिन्ता दूर हुइजात हए औ दुब,भुजा घरकी छानीम फेकनसे घरमे रहे साँप, बिछी बाहिर निकरजात हएँ थारु समाजमे पुरानी जनविश्वास कायम हए ।

गुरही–गुरहा ठठाएके नदिया या कुलाम पोहात हएँ । जक मतलब बिनके मारके दाह संस्कार करो महसुस करत हएँ । समाजकी दुश्मनकी रुपमे रही डैनी भुत प्रेत गाावकी चौराहोमे मारपिट करके दाहसंस्कारके ताँही नदियामे पोहानसे गाँवमे फिर दुःख देन कभु ना आत हए कहिके सामुहिक रुपमे पोहात हएँ ।

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